Tuesday, January 27, 2009

सोचो भाग्य किनका

सड़क किनारे बैठे बे लोग जो अपना भाग्य नही जानते सड़क से गुजर रहे हर आदमी का भाग्य देख कर उशकी तकदीर को पढ़ते है अगले पल आने बाले अतिक्रमण दस्ते की जानकारी इन्हे कभी अपना भाग्य देख कर नही लगती दरअसल इनके पास बे ही लोग आते है जोपहले से हिय तो अपनी खामियाना जानना चाहते है याफिर सिर्फ़ अपने बारे मैं अच्छा भाग्य किसका है बे दोनों ही नही जानते पर भरोसा ही काफी है

Friday, January 23, 2009

बात पुरानी है

ये उन दिनों की बात है जब मैंने पत्रकारिता सुरू की थी मानो सब कुछ अलग सा था बश बड़ा ओउर बड़ा बन्ने की चाहत थी रोज नए नए विचार आते थे सब से हटकर कुछ अलग कर दिखने का जज्बा दिल मैं कोंधता था पर जो करता था बह दूसरों के हिसाब से ठीक नही होता था रोज दूसरों के लेख पढ़ना फिर उस्सी से सीखना काफी दिन तक येही चलता रहा करता भी क्या कोई और कोई दूसरा चारा भी तो नही था नही कोई गुरू था जो बता सके सब कुछ सहते घर वालों दोस्तों रिश्तेदारों के सामने अपनी इज्जत बचने का डर भी तो था अकेले अपने ही अन्तर मन से बातें करके ख़ुद को समझा लेता था एक दिन मेरा एक्दोस्त अमित भट्टाचार्य मिला जिसने बिना कुछ कहे मुझसे सब कुछ कहा वह बात मुझे अभी भी याद है उसने खा था तुम जो कर रहे हो वही ठीक है किसी के बारे मैं मत सोच जो भी जिससे भी सीखने मिले सिर्फ़ सीख सब के साथ सब के लिए अच्छा सोच अपने आप के द्वारा

Sunday, January 18, 2009

मैंने भी देखा

तुम भूख से मर गए कोई बात नही उनके जुखाम के भी समाचार हो गए यह बात उतनी ही जो मंजर मैंने देखा सड़क पर तड़पता एक अस्सी साल का बूढा जिश्के पूरे सरीर पर घाव थे हर कोई मदद करना चाह रहा था पर किसी ने हिमत नही उठाई सभी की आंखों मैं दया का भाव था वहां मैं भी था पर अपनी हिचक ओउर लोग क्या कहेंगे इस चक्कर मैं मैंने भी अंदरूनी शाहंबूती ही दिखाई मैं आज भी शार्मिंदा हूँ