ये उन दिनों की बात है जब मैंने पत्रकारिता सुरू की थी मानो सब कुछ अलग सा था बश बड़ा ओउर बड़ा बन्ने की चाहत थी रोज नए नए विचार आते थे सब से हटकर कुछ अलग कर दिखने का जज्बा दिल मैं कोंधता था पर जो करता था बह दूसरों के हिसाब से ठीक नही होता था रोज दूसरों के लेख पढ़ना फिर उस्सी से सीखना काफी दिन तक येही चलता रहा करता भी क्या कोई और कोई दूसरा चारा भी तो नही था नही कोई गुरू था जो बता सके सब कुछ सहते घर वालों दोस्तों रिश्तेदारों के सामने अपनी इज्जत बचने का डर भी तो था अकेले अपने ही अन्तर मन से बातें करके ख़ुद को समझा लेता था एक दिन मेरा एक्दोस्त अमित भट्टाचार्य मिला जिसने बिना कुछ कहे मुझसे सब कुछ कहा वह बात मुझे अभी भी याद है उसने खा था तुम जो कर रहे हो वही ठीक है किसी के बारे मैं मत सोच जो भी जिससे भी सीखने मिले सिर्फ़ सीख सब के साथ सब के लिए अच्छा सोच अपने आप के द्वारा
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